बेटी पर कविता लिखते हुए मैं यह कहना चाहूंगी कि बड़ी बिडम्बना है कि घर से लेकर और बाहर समाज में कहीं भी जब बेटियों पर बात होती है तो हर कोई उनके लिए चिंतित होता है, उनका पक्षधर होता है, हर कोई महिला सम्मान की बात करते हुए दिखाई देता है... मगर जब महिलाओं से पूछा जाता है तो शायद ही कोई महिला होगी जो ये कहे कि मुझे आज तक किसी ने गलत तरीके से नहीं छुआ, गलत तरीके से बात नहीं की या मैंने कभी स्वयं को असुरक्षित महसूस नहीं किया।
कौन लोग होते हैं जो महिलाओं को इस तरह असुरक्षित महसूस करवाते हैं ? मैं महिला के प्रति पुरुषो की भावना पर व्यंग्य करती हूँ। साथ ही बेटो के प्रति उस माँ की जबाबदेही पर प्रश्न चिन्ह लगाती हूँ जो बेटे इस प्रकार के अपराध को अंजाम देते है। मेरा वाक्य सम्पूर्ण महिलाओ व सम्पूर्ण पुरुषो पर कतिपय लागू नहीं होता है।
व्यवहार
ये पंक्तियाँ मैंने हैदराबाद प्रियंका रेड्डी केस से आहत होने के बाद लिखी थी। यह पंक्तियाँ पुरुषों पर नहीं उन महिलाओं को झकझोरने के लिए लिखीं गयी हैं, जो अपने घर के बेटों को सही तरीके से समझा नहीं पाती कि उनका व्यवहार महिलाओं के प्रति कैसा होना चाहिए ?, जो अपने घर के पुरुषों द्वारा किसी महिला का मजाक बनाए जाने पर उनको फटकारने के बजाय ही-ही कर हँसती हैं, जो स्वयं महिला होकर दूसरी महिला के चरित्र को खराब बताकर पुरुषों द्वारा की गई अभद्रता को सही ठहराती हैं।
विरोध
अपराध में लिप्त महिला- पुरुषों की बात मैं यहाँ पर नहीं करूँगी। मैं यहाँ अपने सभ्य समाज की बात करूँगी.... क्या सब महिलाएँ एक होकर पुरुषों द्वारा कसी जाने वाली फब्तियों का विरोध नहीं कर सकती?? क्या वे विभिन्न पदों पर नियुक्त महिलाओं पर बनने वाले चुटकलों का विरोध नहीं कर सकती?? उदाहरण रूप में "नर्सों" पर कितने घटिया चुटकुले बनाते हैं लोग... आपकी हमारी बेटियाँ नर्स हैं तो क्या इस तरह की बातों का विरोध नहीं होना चाहिए ?? मैं सब महिलाओं को कहना चाहूँगी कि बेटे व बेटी को नैतिक मजबूती दें, हो सके तो घर के हर पुरुष को उसकी गलती तुरंत बताएँ कि मजाक मजाक में कही गई बातें एक परंपरा का रूप ले लेती हैं, "इतना तो चलता है" यह कहना ही अपराध का रूप ले लेता है।
- कवयित्री सुनीता ध्यानी
अभिमन्यु सी नारी
सीता नहीं कहूँगी तुमको;
ना सावित्री कहना है।
ना द्रोपदी हो;
हाँ अभिमन्यु तुमको बना दिया है।
ना संग तुम्हारे पांडव;
कौरव से तुमको लड़ना है।
हैवानों ने कुचक्रव्यूह की;
भेंट तुम्हें चढ़ा दिया है।
तुम निर्बल हो एक नारी हो;
ये भ्रम तुम्हारा बहाना है।
हाँ चक्रव्यूह से हो अनभिज्ञ;
जिन्दा तभी जला दिया है।
गुरु द्रोण और पितामह को;
चुप आज भी रहना है।
उनके मौन ने दु:शासन का;
साथ सदा दिया हुआ है।
सबल एवं सक्षम नारी !
तुम्हें अभिमन्यु सा ही डटना है।
मिलकर आओ एक बार;
हर कौरव तुमसे डरा हुआ है।
एक अकेले अभिमन्यु को तो;
भेंट व्यूह की चढ़ना है।
एकजुट होकर सोचो तो;
हल इसमें ही छुपा हुआ है।
पिता या पति या बेटा;
जिसने नारी का मान न करना है।
सबके सम्मुख फटकारो उन्हें;
चाहे वो तुमसे जुड़ा हुआ है।
घर से निकले मर्द ने;
अगर चक्रव्यूह रचना है।
समझाओ बातों या नातों से;
आज फैसला यही हुआ है।
- कवयित्री सुनीता ध्यानी
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महिलाओ के प्रति कतिपय पुरुषो की भावना एवं बेटो के प्रति माँ की जबाबदेही का आपने निडर होकर जो व्यंग्यात्मक लेख एवं कविता लिखी है मै उससे काफी प्रभावित हुआ हूँ। मैंने जब भी कोई व्यंग्यात्म लेख व कविता लिखी है तब -तब व्यंग्यात्म लेख एवं कविता के प्रति मेरा मनोबल कमजोर रहा है। व्यंग्यात्मक होने पर मैंने अपने को हमेशा असहज महसूस किया है। मुझे ज्ञात है कि एक लेखक एवं पत्रकार का जन्म समाज में मनोरंजन एवं हास्य विषय वस्तु के अतिरिक्त समाज में उत्पन बुराइयों को दूर अथवा समाज को नई दिशा प्रदान करने के लिए भी हुआ है। एक लेखक एवं पत्रकार का धर्म है कि वह निडर होकर समाज एवं देश की अच्छाई के लिए निडर होकर आगे कदम बढ़ाये। हमें समाज , परिवार , गांव ,शहर एवं देश -दुनिया में एक - दूसरे से सीखकर , साहस एवं जिज्ञासा के साथ देश एवं समाज हित में निर्भीक होकर सही मार्ग का चुनाव करना है।
घटना
हैदराबाद में डॉ प्रियंका रेड्डी के साथ हुए घटना के बाद एक अच्छे आम नागरिक की भाँति मैं भी बहुत आहत हुआ था। समाज में इस प्रकार की घटनाओं का हमें अपने-अपने स्तर से विरोध करना है। ताकि समाज में इस प्रकार की घटनाओ को समाप्त किया जा सके।
पीड़ा
यह कविता नारी की पीड़ा को बंया करती है। कतिपय पुरूष का समाज में व्यवहार एक नारी की भावना को आहत करते हुए कैद कर देती है। कतिपय एक पुरुष की मानसिकता नारी की स्वतंत्रता को दफ़न कर देती है। कतिपय पुरुष एवं समाज को स्वयं का मूल्यांकन कर नारी की पीड़ा को समझना चाहिए।
- कवि ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न"
पुकार
चक्षु खोलकर देख इन्शान ,
हर -पल मैं लड़ती हूँ।
क्षणभर नींद टूटती तेरी ,
मैं नींद के लिए तड़पती हूँ।।
तेरी आग में जलकर इंशान ,
हर दिन ज्वाला मैं देखती हूँ।
बुरा सपना तूने देख लिया ,
मैं तेरे सपने से डरती हूँ।।
उस दिन द्रोपदी का चीरहरण ,
मैं हर इंशान में कृष्ण देखना चाहती हूँ।
तुमने फिर से निर्भया देखा,
मैं हर पल निर्भया देखती हूँ।।
संस्कृति में तुम्हारे राम ,
मैं हर इन्शान में राम चाहती हूँ।
लंका भी देख ली राख होकर ,
मैं रावण को फांसी चाहती हूँ।।
पुकार सुन लो मेरी तुम,
कन्या रूप मैं धरती हूँ।
मेरी कोमल कली न तोड़ ,
मैं तुमसे प्रार्थना करती हूँ।।
- कवि ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न"
पसरी पहाड़ों में हैं अभी भी;
वे दुश्वारियाँ जिन्हें हम सह ना सके थे
और जाके मैदानों में जा बसे थे।
वे उतार और चढ़ाव; वे पथरीली राहें
फूलती साँसे और चुभती हवाएँ;
-कवयित्री सुनीता ध्यानी
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उम्र के उस दौर में सफर कर रही हूँ।
जहाँ परिभाषा स्वयं की गढ़ रही हूँ।
बहुत देख चुकी जमाने की नजर से;
अपनी नजर से खुद को अब देख रही हूँ।
-कवयित्री सुनीता ध्यानी
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जीवन की गहराई में जाकर,
कुछ क्षण तुमसे बात करके,
पूछ लिया हाल सखा तुम्हारा।
बचपन के तुम सखा पाकर,
कसूर दिल का समझा करके,
गुजरा समय कवि असहाय तुम्हारा।
-ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न "
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मोह जाल में फँसकर हम ,
भूल गए जीवन की शान ।
जन्मदाता मेरे पालनकर्ता तुम ,
हम छोड़ गए अपना भगवान ।।
-ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न "
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रिश्तों की सुन्दर डोर हाथ में,
बन्धन एक सवेरा बना।
कदम बढ़ते गए जिनके हर रोज,
उनका मंजिल में नया डेरा बना।।
रिश्तों की मर्यादा को छूकर,
मंजिलों का स्वर्ण महल बना।
-ईश्वर तड़ियाल "प्रश्न "
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1 Comments
धन्यवाद "देवभूमि कवि दर्शन" 🙂
ReplyDeleteबढ़िया भाव तड़ियाल जी!